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बस्ती मंडल का महा-घोटाला: महिलाओं की आत्मनिर्भरता या संगठित डकैती? आधी आबादी से पूरा धोखा: ‘मीना एंड कंपनी’ ने डकारे समूहों के 50 लाख!

नेताओं की 'भीड़' और ठगों का 'शिकार': कब तक लुटेगी बस्ती की भोली नारी? गणेशपुर कांड: अपनों ने ही रेता विश्वास का गला, बैंक के कर्ज तले दबीं बेबस महिलाएं।

अजीत मिश्रा (खोजी)

विशेष पड़ताल: स्वयं सहायता समूह या ‘ठगी का नया अड्डा’? कब तक ‘जागरूकता’ की बलि चढ़ती रहेंगी महिलाएं?

ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश)

  • NRLM बना राजनीतिक अखाड़ा: रैलियों में भीड़ जुटाने की मशीन बनीं समूह की महिलाएं!
  • खाकी की ढिलाई या जालसाजों की चतुराई? समझौते के बाद कैसे फुर्र हुए ₹50 लाख के लुटेरे?
  • सरकारी योजना पर ठगों का कब्जा: आत्मनिर्भर बनाने आए बैंक, अब दरवाजे पर दे रहे ‘कुर्की’ की दस्तक!
  • सावधान! आपकी ‘बिटिया’ और ‘भाभी’ भी हो सकती हैं ठग; गणेशपुर की लूट से लें सबक।
  • जागो नारी जागो! नेताओं के ‘फरमान’ और ठगों के ‘लालच’ ने तबाह किए हजारों घर।
  • समूह की महिलाएं ध्यान दें: आपका एक अंगूठा आपको बना सकता है सड़क का भिखारी!

बस्ती। उत्तर प्रदेश में ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले ‘स्वयं सहायता समूह’ (SHG) आज भ्रष्टाचार, राजनीतिक शोषण और संगठित ठगी के मकड़जाल में फंस गए हैं। बस्ती जिले के गणेशपुर से सामने आया ताजा मामला महज एक अपराध नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था पर तमाचा है जो महिलाओं को ‘आत्मनिर्भर’ बनाने का दंभ भरती है। सवाल सीधा है— अगर महिलाएं अब भी जागरूक नहीं हुईं, तो क्या वे इसी तरह भेड़-बकरियों की तरह लुुटती और हांकी जाती रहेंगी?जनपद के गणेशपुर से लेकर ग्रामीण अंचलों तक ‘स्वयं सहायता समूह’ के नाम पर जालसाजी का जो गंदा खेल चल रहा है, उसने न केवल सरकारी योजनाओं की धज्जियां उड़ाई हैं, बल्कि आधी आबादी के विश्वास को भी लहूलुहान कर दिया है। सवाल बड़ा है— अगर समूह की महिलाएं अब भी ‘जागरूक’ नहीं हुईं, तो आखिर कब तक यूं ही लुुटती रहेंगी?

1. अपनों ने ही दिया जख्म: ₹50 लाख की ‘अपनों वाली’ लूट

गणेशपुर में विश्वासघात की ऐसी कहानी लिखी गई जिसने पूरे बस्ती मंडल को हिलाकर रख दिया है। गाँव की ही ‘बिटिया’ मीना (पुत्री परसराम) ने अपने पति राकेश और सहयोगियों के साथ मिलकर गाँव की महिलाओं को अपनी मीठी बातों के जाल में फंसाया।गणेशपुर का ताजा मामला प्रदेश के लिए एक चेतावनी है। यहाँ समूह की महिलाओं को ‘डबल मनी’ और ‘समृद्धि’ का ऐसा सब्जबाग दिखाया गया कि उन्होंने अपनी मेहनत की कमाई और बैंक से लिया गया कर्ज, अपनों के ही हाथ में सौंप दिया। नतीजा? ₹50 लाख का भारी-भरकम चूना! हैरानी की बात यह है कि लूटने वाला कोई बाहरी दुश्मन नहीं, बल्कि गांव की ही ‘बिटिया’ और ‘भाभी’ निकलीं। मीना और राजेश्वरी जैसी अपनों ने ही विश्वास की नींव पर विश्वासघात की ऐसी इमारत खड़ी की, जिसके नीचे आज दर्जनों गरीब परिवार दबे हुए हैं।

  • षड्यंत्र: महिलाओं को प्लास्टिक कॉम्प्लेक्स स्थित बैंकों में ले जाकर उनके खाते खुलवाए गए और लोन पास कराए गए।
  • ठगी का पैमाना: जैसे ही लोन की राशि खाते में आई, ‘मीना एंड कंपनी’ ने बड़ी चालाकी से महिलाओं को पैसा दोगुना करने का लालच देकर ₹50 लाख से अधिक की धनराशि हड़प ली।
  • धोखेबाज परिवार: इस जालसाजी में मीना के साथ उसकी भाभी राजेश्वरी, अंजू, उषा, ज्योति, सुगना और गुड़िया समेत आधा दर्जन लोग शामिल थे। पुलिस ने धारा 406 और 420 के तहत मुकदमा तो दर्ज किया, लेकिन आरोपियों की चालाकी देखिए— समझौते के बहाने समय लिया और फिर रफूचक्कर हो गए।

2. ‘भीड़ जुटाने की मशीन’ बन गई हैं समूह की महिलाएं

रिपोर्ट में सबसे कड़वा खुलासा समूहों के राजनैतिक दुरुपयोग को लेकर हुआ है। यह बेहद शर्मनाक है कि जिन महिलाओं को उद्यमी बनना था, उन्हें राजनेताओं की रैलियों में ‘सिर गिनने’ के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।रिपोर्ट में कड़वा सच उजागर हुआ है कि इन समूहों का इस्तेमाल केवल आर्थिक धोखाधड़ी के लिए ही नहीं, बल्कि राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए भी किया जा रहा है।

  • सत्ता का दबाव: जब भी किसी बड़े नेता की जनसभा होती है, एनआरएलएम (NRLM) के अधिकारियों के माध्यम से महिलाओं को जनसभा में शामिल होने का अघोषित ‘फरमान’ जारी कर दिया जाता है।
  • मजबूरी की दिहाड़ी: महिलाओं से जब पूछा जाता है कि वे स्वेच्छा से आई हैं, तो जवाब मिलता है— “हमें आदेश दिया गया है।” उन्हें ₹500 की दिहाड़ी और आने-जाने के किराये का लालच देकर लोकतंत्र के नाम पर भीड़ का हिस्सा बना दिया जाता है।

3. आत्मनिर्भरता का सपना… कर्ज की कड़वी हकीकत

सरकार का उद्देश्य था महिलाओं को सशक्त करना, लेकिन हकीकत इसके उलट है। आज गणेशपुर और आसपास की महिलाएं:

  • बैंक के दबाव में: ठग तो पैसा लेकर भाग गए, लेकिन बैंक के रिकवरी एजेंट रोज इन गरीब महिलाओं के दरवाजे पर खड़े होते हैं।
  • दोहरी मार: घर में खाने को दाने नहीं हैं, ऊपर से बैंक के कर्ज का ब्याज पहाड़ की तरह बढ़ रहा है। जो महिलाएं स्वावलंबन की राह पर चली थीं, आज वे पुलिस थानों और कचहरी के चक्कर काटने को मजबूर हैं।

पुलिसिया कार्रवाई और बैंक का दबाव: दोहरी मार

ठगी की शिकार महिलाएं आज दोराहे पर खड़ी हैं। एक तरफ पुलिस में धारा 406 और 420 के तहत मुकदमा तो दर्ज हो गया है, लेकिन मुख्य आरोपी ‘मीना एंड कंपनी’ समझौते के बाद भी फरार है। दूसरी तरफ, बैंक वाले कर्ज वसूली के लिए रोज दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं।

सवाल प्रशासन से है: जिन महिलाओं को “आत्मनिर्भर” बनाने का सपना दिखाकर लोन दिया गया था, वे आज “कर्जदार” और “लाचार” क्यों बना दी गईं? प्रशासन की ढिलाई ने जालसाजों के हौसले इतने बुलंद कर दिए हैं कि वे सरेआम लूट मचा रहे हैं।

सावधान! अब जागने का वक्त है

यह रिपोर्ट उन तमाम समूहों के लिए एक चेतावनी है जो किसी के भी झांसे में आकर अपना बैंक खाता और लोन का पैसा दूसरों के हवाले कर देती हैं।

  • लालच से बचें: पैसा दोगुना करने वाली फर्जी स्कीमों को लात मारें।
  • कागजों पर नजर: बिना सोचे-समझे किसी भी दस्तावेज या चेक पर हस्ताक्षर न करें।
  • ईमानदारी ही ढाल: समूह के भीतर लेन-देन में पारदर्शिता रखें, ताकि कोई ‘मीना’ या ‘राजेश्वरी’ आपकी जमा-पूंजी न छीन सके।

बस्ती की इन भोली-भाली महिलाओं की बर्बादी का कारण कहीं न कहीं उनकी अत्यधिक सरलता और जानकारी का अभाव है।

चेतावनी: समूह की महिलाओं को यह समझना होगा कि बैंक खाता और सिग्नेचर उनकी अपनी ताकत है। इसे किसी ‘मीना’ या ‘राजेश्वरी’ के हाथ में थमाना अपनी बर्बादी के वारंट पर साइन करने जैसा है। प्रशासन और पुलिस की सुस्ती भी इन लुटेरों के हौसले बढ़ाती है। आखिर क्यों आरोपी समझौते के बाद फरार होने में कामयाब रहे?

निष्कर्ष।। यह रिपोर्ट केवल गणेशपुर की नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के हर उस गाँव की है जहाँ ‘समूह’ के नाम पर खेल हो रहा है। अगर आप जागरूक नहीं हैं, तो आप केवल एक ‘वोट बैंक’ और ‘ठगी का शिकार’ बनकर रह जाएंगी।

सावधान रहें, शिक्षित बनें और अपने हक के लिए लड़ना सीखें। वरना, लूट का यह सिलसिला कभी खत्म नहीं होगा।

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